• असभ्य सार्वजनिक जीवन और दूषित राजनीति ने किया मातृभाषा और कलाओं से वंचित

    असभ्य सार्वजनिक जीवन और दूषित राजनीति ने किया मातृभाषा और कलाओं से वंचित0

    अशोक वाजपेयी : हिन्दी अंचल की बढ़ती धर्मांधता, सांप्रदायिकता और हिंसा की मानसिकता आदि का एक कारण इस अंचल की मातृभाषा और कलाओं से ख़ुद को वंचित रहने की वृत्ति है. स्वयं को कला से दूर कर हम असभ्य राजनीति, असभ्य माहौल और असभ्य सार्वजनिक जीवन में रहने को अभिशप्त हैं. ‘हंस’ पत्रिका ने अपने

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  • एक पूर्व सैन्य अधिकारी की पुस्तक पर पाबंदी का फ़ैसला

    एक पूर्व सैन्य अधिकारी की पुस्तक पर पाबंदी का फ़ैसला0

    प्रभाकर मणि तिवारी : भारतीय सेना में सेवा दे चुके दिवंगत ब्रिगेडियर सुशील कुमार शर्मा की लिखी एक किताब “द कॉम्प्लेक्सिटी कॉल्ड मणिपुर: रूट्स, परसेप्शन एंड रियलिटी” पर हाल के महीनों में उठे विवाद के चलते मणिपुर सरकार ने बैन लगा दिया है. सरकार का कहना है कि इस पुस्तक की विषयवस्तु बेहद संवेदनशील है,

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  • जिंदगी पुस्तकालयों में बिता देने वाला वह विलक्षण दार्शनिक

    जिंदगी पुस्तकालयों में बिता देने वाला वह विलक्षण दार्शनिक0

    अपूर्वानंद : मार्क्स पर उनके दो सदी बाद भी बहस-मुबाहसा होता रहता है. एक समय था जब मार्क्स, बौद्धिकता और जवानी का रिश्ता सहज माना जाता था. मार्क्सवादी होने का एक और अर्थ था परिवर्तनकामी होना, बल्कि परिवर्तनकारी होना. अब परिवर्तन का जिम्मा सरकार ने ही ले लिया है. भारत की सरकार ने अपनी एक

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  • अगर ये जानते चुन चुन के हमको तोड़ेंगे तो गुल कभी न तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू करते

    अगर ये जानते चुन चुन के हमको तोड़ेंगे तो गुल कभी न तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू करते0

    अशोक वाजपेयी : दिल्ली की गलियां छोड़कर दकन के बुलावे पर वहां न जाने वाले उर्दू के शायर शेख इब्राहीम ज़ौक का एक चयन रेख़्ता क्लासिक्स के अन्तर्गत फ़रहत एहसास के संपादन में आया है. उसे उलट रहा था कि ध्यान इन दो शेरों पर अटक गया- अगर ये जानते चुन चुन के हमको तोड़ेंगे

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  • समय से कई जरूरी सवाल और जिरह करतीं 5 किताबें

    समय से कई जरूरी सवाल और जिरह करतीं 5 किताबें0

    तीन दशक तक हिंदी पत्रकारिता, साहित्य-सृजन के साथ ही श्रमिक आंदोलनों में भी समान रूप से सक्रिय रहे जयप्रकाश त्रिपाठी के कविता-संग्रह ‘ईश्वर तुम नहीं हो’, ‘तुक-बेतुक’, ‘जग के सब दुखियारे रस्ते मेरे हैं’ एवं पत्रकारिता पर ‘मीडिया हूं मैं’ (‘बाबू विष्णुराव पराड़कर पुरस्कार’ से सम्मानित) और ‘क्लास रिपोर्टर’ के बाद, हाल ही में पांच

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  • लिटरेचर विद नेचर : शिमला में काव्य-कला-संस्कृति के साथ लोग आते गए और कारवाँ बनता गया

    लिटरेचर विद नेचर : शिमला में काव्य-कला-संस्कृति के साथ लोग आते गए और कारवाँ बनता गया0

    हिमाचल प्रदेश की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘लिटरेचर विद नेचर’, उत्तराखंड की मासिक साहित्यिकी ‘कविकुंभ’ एवं बीइंग वुमन, शिमला की प्रसिद्ध स्थाओं ‘कीकली चेरिटेबल ट्रस्ट’, ‘शिमला वॉक्स’ एवं ‘पोएटिक आत्मा’ के साझा संयोजन में बीते कुछ महीनों से अनवरत हो रहीं विविधतापूर्ण प्रस्तुतियों ने राज्य के रचनाधर्मियों, बौद्धिक तबकों का ध्यान अपनी ओर जितनी शिद्दत के साथ

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