विपिन बनियाल / अविकल थपलियाल : विदाई के गीत, चाहे हिंदी फिल्मों में हों या फिर आंचलिक फिल्मों में, उनका अपना प्रभाव उभरता है। उत्तराखंडी सिनेमा में बहन-बेटियों की विदाई के गीतों को खास जगह मिली है। अपने-अपने अंदाज और अपने-अपने हिसाब से विदाई के इन गीतों को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। उत्तराखंडी
विपिन बनियाल / अविकल थपलियाल : विदाई के गीत, चाहे हिंदी फिल्मों में हों या फिर आंचलिक फिल्मों में, उनका अपना प्रभाव उभरता है। उत्तराखंडी सिनेमा में बहन-बेटियों की विदाई के गीतों को खास जगह मिली है। अपने-अपने अंदाज और अपने-अपने हिसाब से विदाई के इन गीतों को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। उत्तराखंडी सिनेमाई इतिहास में विदाई के दो गीत सबसे खास हैं। इनका पिक्चराइजेशन, धुन-बोल सब कुछ अच्छा रहा है, लेकिन इनके खास होने की वजह दूसरी है और यह वजह है इन गीतों से जुड़ी मखमली आवाज। यह मखमली आवाज रही है उदित नारायण और जसपाल सिंह की।
वर्ष 1983 में रिलीज हुई गढ़वाली फिल्म जग्वाल के लिए उदित नारायण ने विदाई गीत गाया था। जिस वक्त यह फिल्म रिलीज हुई, उस वक्त अपनी पहचान के लिए उदित नारायण संघर्ष कर रहे थे। हालांकि जग्वाल से पहले उदित नारायण को बॉलीवुड की फिल्मों में गाने का मौका मिल गया था। उन्होंने मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ भी एक एक गाने गाए थे, लेकिन उन्हें नोटिस नहीं किया गया था। जग्वाल के निर्देशक तुलसी घिमेरे और संगीतकार रणजीत गजमीर नेपाल से थे और उदित नारायण का नेपाल कनेक्शन सभी जानते हैं। इस वजह से इस फिल्म में गाने का उदित नारायण को मौका मिल गया और उन्होंने साबित कर दिया कि उनकी आवाज में एक अलग तरह का जादू है।
विदाई का दूसरा खास गीत वर्ष 1990 में सामने आया। फिल्म का नाम था रैबार और गीत के बोल थे- हंसी खुशी हवे जा विदा, मेरी लाडी न रूवे तू। रैबार के इस गीत में जो मखमली आवाज सुनाई देती है, वह जसपाल सिंह की है। रैबार में गाने के लिए फिल्म के निर्माता किशन एन पटेल ने जब उनसे संपर्क किया, तो उस वक्त उनका नाम उदित नारायण की तरह किसी परिचय का मोहताज नहीं था। गीत गाता चल, अंखियों के झरोखे से, नदिया के पार जैसी फिल्मों में एक से बढ़कर एक हिट गीत उनके नाम के साथ जुडे़ हुए थे। जसपाल सिंह ने संगीतकार कुंवर सिंह बावला से गाने की बारीकियों को समझा और विदाई गीत के अलावा दो और गाने फिल्म के लिए रिकार्ड किए। देवी प्रसाद सेमवाल के लिखे विदाई गीत में जसपाल सिंह ने अपनी आवाज का कमाल दिखाया और जुदाई के दर्द को बखूबी उभारा।
उत्तराखंडी सिनेमा में विदाई के ये दो गीत किसी धरोहर की तरह महफूज है। जग्वाल के निर्माता पाराशर गौड़ बताते हैं कि जिस वक्त वह इस फिल्म का निर्माण कर रहे थे, उस वक्त उदित नारायण को कोई नहीं जानता था। मगर जब उन्होंने उन्हें साइन करने से पहले उनसे कुछ गाने सुने, तो वह प्रभावित हुए बगैर नहीं रहे। उदित नारायण की आवाज की मौलिकता और ताज़गी ने फिल्म के गानों में नई जान फूंकी और इससे फिल्म को प्रभाव छोड़ने में मदद मिली।
जग्वाल का विदाई गीत गाने वाले उदित नारायण नेपाली फिल्मों में गा चुके थे और पहाड़ के मिजाज को अच्छे से जानते थे। इसलिए विदाई के गाने में उनकी आवाज का प्रभाव अलग ही दिखता है। मगर सैल्यूट सरदार जसपाल सिंह के लिए भी है, जिन्होंने पहाड़ की आत्मा को पहचानते हुए विदाई के गीत में नया रंग भरा। फिल्म रैबार के संगीतकार कुंवर सिंह बावला बताते हैं कि पहाड़ी गीत-संगीत को समझने-जानने में जसपाल सिंह को शुरू में दिक्कत जरूर आई, लेकिन उन्होंने सीखने में पूरी दिलचस्पी दिखाई और पूरे मनोयोग से विदाई के गीत गाकर उसे यादगार बना दिया। (‘अविकल उत्तराखंड’ से साभार)
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